यादें बचपन की
कभी-कभी दिल के किसी कोने से
एक आवाज़ सी आती है,
बीते हुए उन सुनहरे दिनों की
याद बहुत सताती है।
वो सुबह बिना किसी चिंता के,
वो शाम दोस्तों के नाम,
छोटी-छोटी खुशियों में बसता था
अपना पूरा जहान।
न कोई मंज़िल पाने की जल्दी थी,
न कल की कोई फिक्र,
आज में जी लेना ही शायद
था बचपन का असली ज़िक्र।
माँ की आवाज़ सुनकर भी
खेल में खोए रह जाना,
देर से घर पहुँचने पर
फिर कोई बहाना बनाना।
वो बारिश की पहली बूंदों में
खुशियों से भर जाना,
कागज़ की छोटी नाव बनाकर
पानी में उसे बहाना।
गली के वो अपने साथी,
वो खेल और शरारतें,
हारने पर रूठ जाना
और फिर पल में दोस्ती की बातें।
गर्मी की लंबी दोपहरों में
छत पर सपने सजते थे,
दादी-नानी की कहानियों में
राजा-रानी सच लगते थे।
कभी मिट्टी से घर बनाना,
कभी पतंगों के पीछे भागना,
छोटी सी बात पर हँस देना,
और पल भर में आँसू बहाना।
स्कूल की घंटी, बस्ता भारी,
होमवर्क से जी चुराना,
सुबह-सुबह पेट दर्द का
कोई नया बहाना बनाना।
जेबें भले ही खाली रहती थीं,
दिल मगर अमीर हुआ करता था,
एक टॉफी बाँट लेने से भी
दिन खुशनुमा हुआ करता था।
न रिश्तों में कोई हिसाब था,
न दिल में कोई दूरी थी,
जो अपना था, बस अपना था,
यही बचपन की मजबूरी थी।
आज सब कुछ पास है फिर भी
कुछ कमी सी रह जाती है,
भीड़ भरी इस दुनिया में
वो मासूमियत याद आती है।
जिंदगी बहुत आगे निकल गई,
वक्त भी कहाँ ठहरता है,
पर मन का एक छोटा बच्चा
आज भी वहीं बिखरता है।
काश, फिर से वो दिन मिल जाते,
कुछ पल फिर बेफिक्र हो जाते,
न कोई चिंता, न कोई डर,
बस अपने सपनों का होता सफर।
वक्त भले वापस न आए,
उम्र भले आगे बढ़ जाए,
दिल में हमेशा जिंदा रहेंगी—
वो हँसी, वो खेल, वो प्यारे पल,
वो बचपन की अनमोल निशानियाँ,
जिंदगी की सबसे खूबसूरत पूँजी हैं—
मेरी बचपन की यादें पुरानियाँ।
— यादें बचपन की —
Kavi - G D Pandey
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