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Sunday, January 24, 2021

SREE GEETA YOG PRAKASH श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3

SREE GEETA YOG PRAKASH 

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 3

कर्म - योग 


कर्म बिना नर कभी न रहता, नर का बही स्वभाव ।
राग - व्देष संग में रहने से , सुख क सदा अभाव ।।

जो कर्तव्य मात्र करता है, लोभ लाभ को तजकर ।
उसका लाभ अनंत गुणा है, रक्षक प्रभु को मजकर ।।

बिना लोभ उपयुक्त कर्म से, सदा मोक्ष अधिकारी ।
यही कर्म है कर्म - योग, जिसकी महिमा अति भारी ।।
चंचल गति वाला मन भागे, तू मत जाय शरीर ।
धीरे - धीरे मन को साधो, प्रभु हरेगे पीर ।।

जो जग का सब कर्म तजोगे, पर हितार्थ सब कर्म ।
बिना कर्म बैठे रहना भी, है भारी दुष्कर्म ।।
जनक, कृष्ण, अवतार सभी, सब संतो को भी देखा ।
सबने कर्म निभाया अपना, रख आदर्श अनोखा ।।

कर्मेन्द्रिय से कर्म करे, संयमित रहे मन वशकर ।
क्या यह सुगम महा है, इस माया प्रपंच में फंसकर ।।
क्या यह सुख - साम्राज्य मिलेगा, बस मन को समझाये ।
नही नही यहाँ अगम राह है, सुगम सब गुरु पाये ।।

सतगुरु जी बतलाते है, इस मन घोड़े का खूंटा ।
कैसे संध्या ध्यान बने, जिस बिन जग का सुख रूठा ।।
बिना भेंट पाये सतगुरु से, रहे मांग अनबूझा ।
कहाँ शांति मिल पाई किसको, जो अनबूझे जूझा ।।

SREE GEETA YOG PRAKASH श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1

 श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 1

SREE GEETA YOG PRAKASH 
गीता

प्रथम अध्याय  

     अर्जुन विषाद योग
बहुत दिनो की बात हुई यह बात है अमर कहानी ।
पांच हजार बरस बीते है, फिर भी नहीं पुरानी ।।
लिया जन्म भगवान कृष्ण ने , धन्य हुई यह धरनी ।
युद्ध किया कौरव पाण्डव ने , कथा विषय यह वरनी ।। 1

युद्ध भूमी में , पाण्डव दल में, अर्जुन के कोचवान ।
सारथि र्धम निभाया प्रभु  ने, धन्य धन्य भगवान ।।
दुर्योधन थे कौरव दल में,  महाबली गुणवान ।
वृद्ध पिता धृतराष्ट्र थे उनके, स्वामी सहज सुजान ।।  2

SREE GEETA YOG PRAKASH श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 2

SREE GEETA YOG PRAKASH 

अध्याय - 2 

सांख्य योग


युद्ध क्षेत्र में खडे़ हुये हो, यह तो समय विषम है ।

मोह कहॉं से आया अर्जुन, अपयशदायक मन है ।।

पण्डित ज्ञानी सम तव वाणी, मोह मन में लाओ ।

यह न शोका का समय ,करो कर्त्तव्य, वहीं बस ध्यावो।। 6


सब थे पहले ,फिर भी होंगे ,चलता चक पुराना ।

जो भी जन्म लिया मरता है ,नया ही बने पुराना ।।

इस तन में है आत्मा , अमर और अविनाशी।

बसन बदलना होता रहता , क्या मगहर क्या काशी ।। 7

SREE GEETA YOG PRAKASH श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 4

SREE GEETA YOG PRAKASH
श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय - 4

अध्याय - 4
ज्ञान - कर्म - संन्यास योग 

ज्ञान कर्म संन्यास योंग का, वर्णन बहुत पुराना 
पहले प्रभु ने रवि को सुनाया, तनय मनु ने जाना ।।
इक्ष्वाकु थे तनय मनु के मनु ने उन्हें बताया 
इसी भांति राजश्री सभी और मुनियों ने भी पाया ।।

फिर से भगवन ने अर्जुन को, यही ज्ञान बतलाया 
हुआ प्रचार पुन: तन मन से, हम सबने भी पाया ।।
बार - बार के जन्म - मरण का, चक्र सदा चलता है 
पर कुछ याद नही रहता है, इससे यह खलता है ।।

SREE GEETA YOG PRAKASH श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 5

SREE GEETA YOG PRAKASH  

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय - 5 

कर्म सन्यास योंग 

कर्मयोग, सन्यासयोंग, दोनों आपस में पूरक 
द्वेषहीन, इच्छाविहीन, सुख -  दुःख  में कमी न हो तो रत ।।
ऐसे ही सन्यासी जिनका अविरल कर्म स्वभाव 
अति गतिशील चक्र में लखता, स्थिरता का भाव ।।

परम लक्ष्य में तत्परता से, सदा निरत सन्यासी 
उसका कर्म अतुल्य महा है, कर्मयोग अभ्यासी ।।
जैसे रवि दिन -रात पथिक, पर कर्म न करते कोई 
उनका अति उपकार परम, परमार्थ न जग में गोई ।।

सन्यासी का वेश धरे, या घर ग्रहस्थ का योगी 
ज्ञान कर्म संयास योंग से, पूर्ण गृहस्थ का योगी ।।
धीरे - धीरे ही बनता जायेगा, पूर्ण विरागी 
मन का मैल कामना भागे, स्थितप्रज्ञता जागी ।।

मन मंडल में मन बुध्दी चित्त संग, अहंकार की दौड़ 
त्रिकुटी के आगे दौड़ न होती, रंरकार के ठौर ।।
इच्छाओ को रोक सके स्थायी, मात्र विचार 
ऐसा नही कभी हो सकता, यह अति बली विकार ।।

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 6



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श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 7



श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 8


श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 9



श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 10

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 10




श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 11


श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 12

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 12



श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 13


श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 13





श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 15

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 15


श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 14

श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 14




श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 16

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 16



श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 17

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 17




श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 18

  श्री गीता योग प्रकाश - अध्याय 18