Showing posts with label Bhojpuri. Show all posts
Showing posts with label Bhojpuri. Show all posts

Monday, November 23, 2020

Bhojpuri-Kavita - राजेंद्र बाबू से

भारत के पूतS त्र्प्रा सपूत भोजपुर के तूँ 

सांती के स्वरूप त्र्प्रा त्र्प्राकूत बलवाला तूँ 

मूरति पवित्रता के गांधी जी के सूरति तूँ, 

पापिन का सामने गजेन्द्र मतवाला तूँ 

राजन के इन्द्र तूँ राजेन्द्र बाबू हमनों के 

माता जी का मंदिलS के दीपकS उजाला तूँ

लाख बरिसS जीत्र्प्रS त्र्प्रमृतS के घूँघट पीत्र्प्रS

पांडे जी का उरS के त्र्प्रासीस  के लS माला तूँ 

Saturday, May 16, 2020

लिट्टी भंटा कहा भतीजा (Bhojpuri)


लिट्टी भंटा खा भतीजा, भंटा लिट्टी खा

1
सासु पकाबसु, ससुर जेंवावसु
सरहज गावसु गारी । 
निहुरि निहुरि  के सार परोससु
तब खा दही सोहारी 
त्र्प्रपना घरे गवे गवे,
लिट्टी भंटा कहा भतीजा, भंटा लिट्टी कहा ॥ 

Tuesday, May 12, 2020

सुरसती जी के वन्दना (Bhojpuri)


सुरसती ! त्र्पाजू  कंठ  में त्र्पावऽ 
जुग जुग से ई परल संकेता, एकर कंठ रून्हाइल 
लड़त लड़त बैरिन से  भोजपुर  थाकल  त्र्पा   त्र्पाउंघाइल ।।
हिया कमल विकसावऽ, एके जुग संदेस सुनावस ।
                      सुरसती ! जुग संदेस सुनावऽ
                      सुरसती ! त्र्पाजु कंठ में त्र्पावऽ  ।।

2

संस्कृत भासा खातिर ई तऽ त्र्पापन देह गलवलसी ।
हिंदी  अंग्रेजी पर अपना उर के नेह चढ़वलसी ।।
अपनी भासा खातिर एकरा मन में प्रेम जगावऽ 
                     सुरसती ! मन में प्रेम जगावऽ
                     सुरसती ! आजु कंठ में आवऽ ।।


नया छंद दऽ, नया काब्य दऽ, नई गोति दऽ मइया 
छितराइल भोजपुरियन में तूं नई प्रीति दऽ मइया  । ।
नइया भोजपुरियन के माता  ! हंसी के पार लगावऽ 
सुरसती  ! हंसी के पार लगावऽ 
सुरसती ! आजु कंठ में आवऽ । ।
कवि - स्व. डा. रामविचार पाण्डेय (भोजपुरी रत्न )


Thursday, March 19, 2020

अंजोरिया ( भोजपुरी) - डा. रामविचार पाण्डेय

अंजोरिया

1

टिसुना जागलि अपना कृस्न जी के देखे के त,

अधी रतिये खाँ उठि चलली गुजरिया।

चान का निअर मुँह चमकेला रधिका के,

चम-चम चमकेले जरी के चुनरिया।

चकमक-चकमक लहरि उठेले ओमें,

मधुरे-मधुरे डोले कान के मुंनरिया।

गोखुला के लोग इ त देखि के चिहइले कि,

राति में आमावसा का उगली अंजोरिया।

Wednesday, March 18, 2020

विदा - गीत

तुम हमे भूल मत जाना 
क्यो त्र्प्रासु त्र्प्राज मचलते, 
पलको से ठोकर खाकर 
करुणा भर्राये स्वर मे, 
कहती धीरे से त्र्प्राकर 
तेरे सुख - स्वप्नों मे से 
कोई जाने वाला है 
वह एक पुष्प विछुड़ेगा 
जो सुमनों की माला है 
मधुमय मधुर मिलन मे 
होगी विषाद की रेखा 
सुख  दुख त्र्प्राज करेगे 
त्र्प्रापस मे लेखा जोखा 
तुम जाते हो तो जात्र्पो  
रोके हम कैसे जाना 
पर सुख - स्वप्नों के जैसा 
तुम हमे भूल मत जाना 





कवि - स्व। डा. रामविचार पाण्डेय (भोजपुरी रत्न )

हम किसे जवानी कहते है

तुम जिसे जवानी कहते हो, हम तन का पानी कहते है ।
हम त्र्प्राज बताते है तुमको , हम किसे जवानी कहते है ।

जो भिड़ जावे बमगोलो से, टोपो, टैंको, त्र्प्रांगरों से 
त्र्प्रपनी वीणा मुखरित करके, तलवारों का झंकारो से 
जो त्र्प्रारि की छाती पर बैठा, नित राग प्रभाती गाता है 
जिसकी हिम्मत दूनों होती, निशि दिन त्र्प्ररि के ललकारो से 
मेधों सा जो गर्जन करता, बिजली सा चमक दमद बढ़ता 
जो लीक खीच जाता है उसकी, लोग कहानी कहते है
जिसको सुन मुर्दे जग उठते, हम उसे जवानी कहते है
तुम जिसे जवानी कहते हो, हम तन का पानी कहते है ।
हम त्र्प्राज बताते है तुमको , हम किसे जवानी कहते है ।