हे मेरे मनमीत — जीवन को सार्थक बनाने वाली कविता | स्व. विजय शंकर पाण्डेय
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रचनाकार: स्व. विजय शंकर पाण्डेय
प्रस्तुति एवं भावार्थ: परिवार के अभिलेख से
नोट: नीचे दी गई कविता स्व. विजय शंकर पाण्डेय की मूल हस्तलिखित रचना के आधार पर प्रस्तुत की जा रही है। भाषा की काव्यात्मक शैली और मूल शब्दों को यथासंभव उसी रूप में रखा गया है। भावार्थ पाठकों की सुविधा के लिए सरल हिन्दी में प्रस्तुत किया गया है।
हे मेरे मनमीत
हे मेरे मन मीत जन्म नहीं व्यर्थ करो।
बीतजाय ये जन्म अकारथ, ऐसा नहीं अनर्थकरो।।
हँसत हँस जीना, खाना बस इतना हो नहीं जीवन।
लाख लाख का अंग मिला, मत समझो ईश दीवानापन।।
दाता इनका ईश-जगत का, माया उनकी बड़ा प्रबल।
माया में हो डूब गया तो, जीवन हेतु हुआ असफल।।
