Showing posts with label Kavita. Show all posts
Showing posts with label Kavita. Show all posts

Monday, November 23, 2020

Bhojpuri-Kavita - राजेंद्र बाबू से

भारत के पूतS त्र्प्रा सपूत भोजपुर के तूँ 

सांती के स्वरूप त्र्प्रा त्र्प्राकूत बलवाला तूँ 

मूरति पवित्रता के गांधी जी के सूरति तूँ, 

पापिन का सामने गजेन्द्र मतवाला तूँ 

राजन के इन्द्र तूँ राजेन्द्र बाबू हमनों के 

माता जी का मंदिलS के दीपकS उजाला तूँ

लाख बरिसS जीत्र्प्रS त्र्प्रमृतS के घूँघट पीत्र्प्रS

पांडे जी का उरS के त्र्प्रासीस  के लS माला तूँ 

Thursday, March 19, 2020

अंजोरिया ( भोजपुरी) - डा. रामविचार पाण्डेय

अंजोरिया

1

टिसुना जागलि अपना कृस्न जी के देखे के त,

अधी रतिये खाँ उठि चलली गुजरिया।

चान का निअर मुँह चमकेला रधिका के,

चम-चम चमकेले जरी के चुनरिया।

चकमक-चकमक लहरि उठेले ओमें,

मधुरे-मधुरे डोले कान के मुंनरिया।

गोखुला के लोग इ त देखि के चिहइले कि,

राति में आमावसा का उगली अंजोरिया।

Sunday, May 3, 2015

प्रभु जी तुम चंदन हम पानी ...... रैदास...


Raidas.jpg
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी। जाकी अंग-अंग बास समानी॥
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा। जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती। जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी तुम मोती हम धागा। जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा। ऐसी भक्ति करै 'रैदासा॥

लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो, ........ सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला"

चित्र:Suryakant-Tripathi-Nirala.jpg

लू के झोंकों झुलसे हुए थे जो, भरा दौंगरा उन्ही पर गिरा।
उन्ही बीजों को नये पर लगे, उन्ही पौधों से नया रस झिरा।
उन्ही खेतों पर गये हल चले, उन्ही माथों पर गये बल पड़े,
उन्ही पेड़ों पर नये फल फले, जवानी फिरी जो पानी फिरा।
पुरवा हवा की नमी बढ़ी, जूही के जहाँ की लड़ी कढ़ी,
सविता ने क्या कविता पढ़ी, बदला है बादलों से सिरा।
जग के अपावन धुल गये,ढेले गड़ने वाले थे घुल गये,
समता के दृग दोनों तुल गये, तपता गगन घन से घिरा।

Saturday, May 2, 2015

एक महा विद्यालय में .... अशोक चक्रधर

अशोक चक्रधर

Ashok chakradhar.jpg
एक महा विद्यालय में 
नए विभाग के लिए
नया भवन बनवाया गया,
उसके उद्घाटनार्थ
विद्यालय के एक पुराने छात्र
लेकिन नए नेता को
बुलवाया गया।


अध्यापकों ने
कार के दरवाज़े खोले
नेती जी उतरते ही बोले—
यहां तर गईं
कितनी ही पीढ़ियां,
अहा !
वही पुरानी सीढ़ियां !
वही मैदान
वही पुराने वृक्ष,
वही कार्यालय
वही पुराने कक्ष।
वही पुरानी खिड़की
वही जाली,
अहा, देखिए
वही पुराना माली।


मंडरा रहे थे
यादों के धुंधलके
थोड़ा और आगे गए चल के—
वही पुरानी
चिमगादड़ों की साउण्ड,
वही घंटा
वही पुराना प्लेग्राउण्ड।
छात्रों में
वही पुरानी बदहवासी,
अहा, वही पुराना चपरासी।
नमस्कार, नमस्कार !
अब आया हॉस्टल का द्वार—
हॉस्टल में वही कमरे
वही पुराना ख़ानसामा,
वही धमाचौकड़ी
वही पुराना हंगामा।
नेता जी पर
पुरानी स्मृतियां छा रही थीं,
तभी पाया 
कि एक कमरे से 
कुछ ज़्यादा ही
आवाज़ें आ रही थीं।
उन्होंने दरवाजा खटखटाया,
लड़के ने खोला
पर घबराया।
क्योंकि अंदर एक कन्या थी,
वल्कल-वसन-वन्या थी।
दिल रह गया दहल के,
लेकिन बोला संभल के—
आइए सर !
मेरा नाम मदन है,
इससे मिलिए
मेरी कज़न है।

Friday, May 1, 2015

खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल,.....

Kaka hathrasi.jpg
खान-पान की कृपा से, तोंद हो गई गोल, रोगी खाते औषधी, लड्डू खाएँ किलोल।
लड्डू खाएँ किलोल, जपें खाने की माला, ऊँची रिश्वत खाते, ऊँचे अफसर आला।
दादा टाइप छात्र, मास्टरों का सर खाते, लेखक की रायल्टी, चतुर पब्लिशर खाते।

दर्प खाय इंसान को, खाय सर्प को मोर, हवा जेल की खा रहे, कातिल-डाकू-चोर।
कातिल-डाकू-चोर, ब्लैक खाएँ भ्रष्टाजी, बैंक-बौहरे-वणिक, ब्याज खाने में राजी।
दीन-दुखी-दुर्बल, बेचारे गम खाते हैं, न्यायालय में बेईमान कसम खाते हैं।

सास खा रही बहू को, घास खा रही गाय, चली बिलाई हज्ज को, नौ सौ चूहे खाय।
नौ सौ चूहे खाय, मार अपराधी खाएँ, पिटते-पिटते कोतवाल की हा-हा खाएँ।
उत्पाती बच्चे, चच्चे के थप्पड़ खाते, छेड़छाड़ में नकली मजनूँ, चप्पल खाते।

सूरदास जी मार्ग में, ठोकर-टक्कर खायं, राजीव जी के सामने मंत्री चक्कर खायं।
मंत्री चक्कर खायं, टिकिट तिकड़म से लाएँ, एलेक्शन में हार जायं तो मुँह की खाएँ।
जीजाजी खाते देखे साली की गाली, पति के कान खा रही झगड़ालू घरवाली।

मंदिर जाकर भक्तगण खाते प्रभू प्रसाद, चुगली खाकर आ रहा चुगलखोर को स्वाद।
चुगलखोर को स्वाद, देंय साहब परमीशन, कंट्रैक्टर से इंजीनियर जी खायं कमीशन।
अनुभवहीन व्यक्ति दर-दर की ठोकर खाते, बच्चों की फटकारें, बूढ़े होकर खाते।

दद्दा खाएँ दहेज में, दो नंबर के नोट, पाखंडी मेवा चरें, पंडित चाटें होट।
पंडित चाटें होट, वोट खाते हैं नेता, खायं मुनाफा उच्च, निच्च राशन विक्रेता।
काकी मैके गई, रेल में खाकर धक्का, कक्का स्वयं बनाकर खाते कच्चा-पक्का।

जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोल ....


Kaka hathrasi.jpg



जन-गण मन के देवता, अब तो आँखें खोल 
महँगाई से हो गया, जीवन डाँवाडोल 
जीवन डाँवाडोल, ख़बर लो शीघ्र कृपालू 
कलाकंद के भाव बिक रहे बैंगन-आलू 
कहँ 'काका' कवि, दूध-दही को तरसे बच्चे 
आठ रुपये के किलो टमाटर, वह भी कच्चे 

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर 
'क्यू' में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर 
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला 
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला 
कहँ 'काका' कवि, करके बंद धरम का काँटा 
लाला बोले-भागो, खत्म हो गया आटा 
Source - kavitakosh

Thursday, April 30, 2015

रहने दो मुझको निर्जन में ........

रहने दो मुझको निर्जन में
काँटों को चुभने दो तन में
मैं न चाहता सुख जीवन में
करो न चिंता मेरी मन में
घोर यातना ही सहने दो
मुझे अकेला ही रहने दो !


मैं न चाहता हार बनूँ मैं
या कि प्रेम उपहार बनूँ मैं
या कि शीश-शृंगार बनूँ मैं
मैं हूँ फूल मुझे जीवन की
सरिता में ही तुम बहने दो
मुझे अकेला ही रहने दो !

नहीं चाहता हूँ मैं आदर
हेम और रत्नों का सागर
नहीं चाहता हूँ कोई वर
मत रोको इस निर्मम जग को
जो जी में आए कहने दो
मुझे अकेला ही रहने दो !



--रचनाकार: गोपालशरण सिंह


-- प्रस्तुति: शारदा सुमन